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हे ! मानव

युद्ध की विभीषिका का धुआं चहुं दिशा
दुनिया में
मंगल का कहर बरपे
बिगड़ न जाए ये फिज़ा।
हर घर
इस धरती का
आफत ने आज घिरा ।
स्वार्थ के वशीभूत हो नर बना नरकासुर
नरक में ढकेलने को
जग के सामने फिर से वो आ खड़ा।
वक्त अब बदल चला
नीच हूं — अपने मुख से बोल चला
अपने सिवाय
न चाहे किसी का वो भला
काल लिखेगा उस की गाथा
धरती पर
मानव की देख व्यथा।
लाल समुंदर में — वो आन फंसा
नरकासुर कलिकाल का
गा रहा वो
अपनी ताकत को रहा जता
नहीं पता उसे धरा के इतिहास की
की उसने बडी खता।
बरसों लगें गे — भरेंगे घाव
दिया था गद्दी जिसे हटा
तूं फिर लाया उसे अब भोग सजा
काल कहे —
कलिकाल में
हे ! मानव तेरी किस्मत में था ये बदा ।

         महेश शर्मा, करनाल

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