
स्त्री का मन सच में अनमोल है,
पर अब वो खुद भी जान गई है मोल है।
जो जग ने कभी समझा ही नहीं,
अब वो खुद अपनी पहचान गई है।
वो चाँदनी भी है, वो ज्वाला भी,
अब सहना ही नहीं सवाल भी है।
सहनशीलता उसकी ताकत है,
पर अब उसकी आवाज़ भी बेमिसाल है।
जो दर्द हँसी में छुपाती थी,
अब शब्दों में उसे सजाती है,
हर रिश्ते में खुद को खोती थी जो,
अब खुद में खुद को पाती है।
वो सागर है पर लहर भी है,
अब शांत नहीं, प्रखर भी है।
प्रेम उसका अब भी गहरा है,
पर आत्मसम्मान से ऊपर कुछ नहीं ठहरा है।
ममता, करुणा, शक्ति, समर्पण
सब कुछ उसमें आज भी है,
पर अब वो खुद के लिए जीना,
अपनी सबसे बड़ी साधना मानती है।
आर एस लॉस्टम













