
हालातों को हवा में उड़ने दे ,
सबकी कुशलता को गले से लगा दे ,
दुनिया से क्या सीखेगा बंदे,
कर्तव्य पथ पर चलना सीख नारी से ।
त्याग और शक्ति की मूरत,
उसको नहीं किसी दया की जरूरत ,
सुख शांति और विश्वास
हर किसी को रहती उससे आस ।
मां ,बहन ,बेटी और पत्नी बनकर,
हर स्त्री ने नई पहचान दी है ,
यह नारी रूप में देवी ही तो है,
जो अग्नि परीक्षा यह आत्म सम्मान,
किसी में भी नहीं वह पीछे है ।
देवी के रूप में सबसे ऊपर ,
कभी दुर्गा कभी काली बनाकर ,
सब पर हमेशा भारी है,
जीवन को स्वर्ग बना दे ,
वह देवी नहीं वह नारी है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













