
सूनी पड़ी थाली, चूल्हा भी रोता है,
भूखे पेट का दर्द हर दिल को खोता है।
रोटी की आस में बीत गई हर शाम,
गरीबी के साए में बुझते रहे अरमान।
नंगे पांव चलते, जलती हुई ये राह,
टूटी सी उम्मीदें, आंखों में बस आह।
मेहनत की धूप में जीवन पिघलता,
फिर भी पेट का गड्ढा कब है भरता।
मां की लोरियां भी अब फीकी पड़ गई,
बच्चों की हंसी भी जैसे कहीं खो गई।
सूखे हुए होंठों पर सवाल ही सवाल,
कब बदलेगी किस्मत, कब आएगा उजाल।
फिर भी दिल में उम्मीद की लौ जलती,
हर अंधियारी रात के बाद सुबह निकलती।
भूखमरी और गरीबी एक दिन हारेंगे,
मेहनत के बल पर हम फिर से निखरेंगे।
कौशल
मुड़पार चु, पामगढ़ जिला जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़।।













