
विषय- रचनाकारों की सरकार से अपेक्षाएं व मांग
विधा- कविता
वर्षों की वो मेहनत अपनी, वर्षों का वो ज्ञान है,
फिर भी एक परीक्षा में अटका, क्यों अपना सम्मान है?
कलम थामकर राष्ट्र गढ़ते, हम ही तो आधार हैं,
फिर योग्यता की कसौटी पर, क्यों बार-बार प्रहार है?
नियमों की इस भूलभुलैया में, उलझ रही है ज़िन्दगानी,
पढ़ाने का जो वक्त था, उसमें लिख रहे संघर्ष की कहानी।
चॉक और डस्टर की जगह, अब कागज़ों का घेरा है,
उम्मीद की उस किरण को ढूंढते, जहाँ नया सवेरा है।
अनुभव की जो पूँजी है, क्या उसका मोल नहीं?
शिक्षक के इस त्याग का, कोई तोल नहीं।
छोड़ो अब ये इम्तिहानों का अंतहीन सिलसिला,
मिले हमें भी हक हमारा, हो न्याय का काफिला।
उठो कि अब ये मौन तोड़ना, वक्त की पुकार है,
गरिमा अपनी वापस पाना, अपना ही अधिकार है।
तप चुके हैं हम बहुत, अब निखरने की बारी है,
परीक्षा से मुक्ति की, अब ज़ोरों पर तैयारी है।
रचनाकार- नंदकिशोर गौतम (माध्यमिक शिक्षक)
शास. उच्च. माध्यमिक विद्यालय बकोड़ी, ब्लॉक सिवनी, म. प्र.













