
ओ शासन की कुर्सी वालों,
ये कैसा फरमान है?
गुरुओं की इस योग्यता का,
क्यों करते अपमान हैं?
सालों सींचा ज्ञान का उपवन,
कलियाँ फूल खिलाई हैं,
आज उन्हीं अनुभवी करों पर,
क्यों? टेट की लाठी चलाई है।
राष्ट्र-निर्माता खड़ा सड़क पर,
कैसी ये तस्वीर है!
आज उन्हीं के माथे पर क्यों,
खींची एक लकीर है?
जिन हाथों ने कलम पकड़ कर,
अफसर तुम्हें बनाया है,
जिनकी दी हुई शिक्षा से ही,
ये साम्राज्य सजाया है।
आज उन्हीं से पूछते हो,
क्या तुम पढ़ना जानते हो?
डिग्रियों के ढेरों को अब,
तुम क्यों नहीं पहचानते हो?
अनुभव के इस समंदर को,
तिनकों से तुम नापते हो,
नीति बनाने वाले खुद ही,
सच कहने से कांपते हो।
बुढ़ापे की दहलीज़ खड़ी है,
बाल सफेदी गाते हैं,
इतने बरसों बाद हमें क्यों,
छात्र बना ले जाते हैं?
वेतन का अधिकार माँगते,
तो तुम पर्चा देते हो,
सम्मान की जगह हाथ में,
बस एक और चर्चा देते हो।
टेट परीक्षा नहीं गुरु की,
ये तो गहरी चोट है,
तुम्हारी मंशा में ही शायद,
कहीं न कहीं कोई खोट है।
जागो ओ सत्ता के स्वामी,
मान हमारा मत छीनो,
शिक्षक ही आधार देश का,
ज्ञान का तारा मत छीनो।
योग्य अगर हम नहीं थे तो फिर,
अब तक क्यों पढ़वाया है?
आज अचानक इस परीक्षा का,
ये भूत कहाँ से आया है?
ओ शासन की कुर्सी वालों,
ये कैसा फरमान है?
गुरुओं की इस योग्यता का,
क्यों करते अपमान है।
रचनाकार
रीना पटले, शिक्षिका
शास.हाई स्कूल ऐरमा, कुरई
जिला -सिवनी (म.प्र.)













