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अंत या आरम्भ

बेटी मेरी लौटी है बहुत दिनों के बाद,
सब कुछ जाना पहचाना है।
पर कुछ अनजानी सी आश,
यह घर तो मेरा था,संग पापा का विश्वास।

बचपन के वह प्यारे सपने,
बहन भाई तकरार।
आने का अब समय कहां,
आई हूं,अपने बच्चों के साथ।

चौखट पर रहती थी आजी,
सुबह-शाम हरीराम।
जपते जपते देखा करती,
स्कूली बस्तों के साथ।

मां का चूल्हा चाकी चलता,
घर से आंगन तक में फैला।
देखा करती सुबह-शाम में,
है अब मेरा भी वही हाल।

मेज पर चश्मा पापा का है,
दूर नज़र या पास।
श्रृष्टि दृष्टि से ऊपर है,
पापा है अब खास।

बेटी मेरी लौटी है बहुत दिनों के बाद ,
बेटी मेरी लौटी है बहुत दिनों के बाद।
कमल

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