
एक टूटी सी खटिया पर, भूख सो जाती है अक्सर,
माँ के आँचल में छुपकर, रोटी का सपना रोता है।
बाप की हथेली के छाले, किस्से सुनाते हैं मेहनत के,
पर किस्मत की दीवारों पर, नाम लिखा होता है धोखे का।
छोटे बच्चे के बस्ते में, किताबों से ज़्यादा उम्मीदें हैं,
फटी कमीज़ में टाँके लगा, माँ कहती “बेटा, कल नए लेंगे”।
वो ‘कल’ कभी आता नहीं, कैलेंडर बदलते रहते हैं,
और आँगन की दीवारों पर, सिर्फ तारीखें उधड़ती हैं।
बारिश आती है तो छत से पहले, आँखों से टपकती है,
सर्दी में अलाव के नाम पर, साँसों को ही जलाते हैं।
गर्मी की दोपहरी में, पसीना ही नमक देता है,
क्योंकि थाली में सब्जी के नाम पर, सिर्फ इंतज़ार परोसा जाता है।
स्कूल की खिड़की से देखता है वो, हँसते-खेलते बच्चों को,
उसके हिस्से की हँसी शायद, किसी अमीर के ड्राइंग रूम में कैद है।
दवा के लिए तरसती माँ, और दुआ के लिए तरसता बाप,
गरीबी सिर्फ हाल नहीं, ये तो पूरी नस्ल का अभिशाप।
फिर भी न जाने क्यों, उसी झोपड़ी में ईमान ज़िंदा है,
चोरी नहीं करता वो पेट के लिए, भूखा ही सो जाता है।
सपने बेचकर रोटी नहीं खरीदता, रोटी के लिए सपने पालता है,
गरीब है पर गैरत से जीता है, इसी बात पर तो भगवान भी शरमाता है।
काश कोई ऐसा सूरज उगे, जो सबकी छत पर एक-सा चमके,
जहाँ भूख जाति न पूछे, और रोटी हैसियत न देखे।
तब तक ये कविता ही सही, आवाज़ बनकर गूंजती रहे,
कि गरीबी लाचारी नहीं, ये समाज की सबसे बड़ी बेईमानी है।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र













