
बढते रहेंगे कदम मंज़िल की ओर
रास्ते में
खुशियों को सांझा कर चलो
बांटते चलो उन सभी को
जो चल रहे
सद् नियत से नियति की ओर
दृढ़ निश्चय हो
लक्ष्य तक पहुंच ही जाना
निश्चित मानों
क्या जरूरत लगाएं लंबी दौड़ ।
लगी है दुनिया में भागम-भाग
आगे निकल जाने की नामालूम एक होड़
जन्म काल पर भाग्य बल जिसे प्राप्त
वही जातक — ‘कर्मठ ‘
जिस का लक्ष्य है निर्धारित
दर्शन शास्त्र कहो या ज्योतिर्बल
जो मिले संस्कारों से
या पूर्व जन्म के संचित– ‘कर्मफल’
दरिद्र कुल में भी पैदा हो कर
कर्मठता का वर पाया
सब को पीछे छोड़ वो आगे बढ़ा
लक्ष्य को छू ले
काहे की देर
ये शास्त्र सम्मत या यूं कहें —
कर्म बल पर ही कर्मफल मिलें
अभी नहीं तो मिलें– देर सवेर।
महेश शर्मा, करनाल













