
विधा- कविता
कुछ ऋण चुकाने अभी बाकी हैं।
सोचा था इसी जीवन में ,
हर ऋण से मुक्त हो जाऊंगी।
नहीं लेना पड़ेगा जन्म दोबारा,
ना ही इस धरती पर आऊँगी।
मेरे इसी अहंकार ने,
शायद मुझे बताया।
कुछ बूंद खून का,
ऋण अभी बाकी है।
लिया जो प्रेम, किया जो श्रृंगार।
मिला जो सिंदूर, सबका ऋण अभी बाकी है।
मातृ पितृ ऋण से ,
मुक्ति अभी बाकी है।
प्रेम और परवाह से,
बने जो जीवन में रिश्ते।
किसी को देना तो,
किसी से पाना अभी बाकी है।
जिंदगी को शायद अब तक,
समझ ही रहे हैं।
जिंदगी को जीना तो अभी,
पूरी तरह बाकी है।
सुनीता (गंगा)













