
विषय- पृथ्वी
विधा- कविता
जिस धरती पर हम रहते हैं।
और धरती माँ जिसको हम कहते हैं।
माँ शब्द में मर्म छिपा है।
क्या इसको समझ हम पाते हैं।
माँ से माटी, माँ से मैया,
क्या दोनों का कर्ज चुकाते हैं।
पंचतत्व का एक तत्व है,
पृथ्वी जिसको हम कहते हैं।
इस साकार शरीर में तुम हो,
नमन तुम्हे हम करते हैं।
पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल, आकाश हर जीव इन्ही से बनते हैं।
जब पंचतत्व आपस मे मिलकर,
प्रेम से जीव बनाते हैं।
हम क्यों इस पृथ्वी पर रहकर,
पृथ्वी के लिए ही लड़ते हैं।
पृथ्वी पर रहकर पृथ्वी को देखो,
बस वो तो देती रहती है।
महसूस करो जरा उसको
जो कुछ वो हमसे कहती है।
देखो मैं कितना सहती हूँ।
सोचा है कितना जलती हूँ।
मेरी छाती फट जाती है।
इतना सहन मैं करती हूँ।
मानो बूढ़ी हो जाती हूँ।
फिर जल्दी ही वक़्त बदलता है।
जिसको हम मौसम कहते हैं।
तब फिर से बारिश आती है।
मैं हरियाली से भर जाती हूँ।
मानो मैं जवां हो जाती हूँ।
यह क्रम चलता रहता है।
मौसम तो बदलते रहते हैं।
पृथ्वी माँ हमसे कहती है।
आओ तुम्हे बतलाती हूँ।
जीवन को जीने और काटने में,
अंतर तुमको समझाती हूँ।
जब भी तुम शिकायत करते हो।
मानो जीवन को काटते हो।
जब खुशियाँ और प्रेम बांटते हो।
तब तुम जीवन को जीते हो।
दुख में हिम्मत मत हारो।
सुख में तुम इतराओ मत।
धैर्य और सहंशाक्ति का,
पाठ तुम्हें पढ़ाती हूँ।
आओ तुम्हें बतलाती हूँ।
आओ तुम्हें समझाती हूँ।।
(धरती हमारी माँ )
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)













