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इन्सान से इंसानियत तक

पानी के झगड़े – मिट्टी में
इन्सान की मत गढ़ो जात रे !
सूरज – चंदा नहीं करते फ़र्क
भेदभाव की क्यों करते बात रे !

मज़लूम की कहानी कहे
आजाद देश के गुलाम रे !
असल मुददों से भटकाते रहें
यह चतुर सिहासी शरात रे !

गोरी चमड़ी – काले धन्धे
अन्धेर नगरी चौपट राजा रे !
झूठी दौलत पर इतराने वाले
सच के पेट पर क्यों मारे लात रे !

जाति – घर्म में बंटता देश
मेरा भारत महान रे !
साहूकारों के नगर में जैसे
कर्ज़दार की निकले बारात रे !

पत्थर पूजे मंदिर – मंदिर
अंधेरे में ज्योत जलाये रे !
इंसानों में बसे उस मालिक को
नौकर क्यों पहुचांये आघात रे !

महल ,कारखाना झूठी तरक्की
मजदूर को कहो जिंदाबाद रे !
शिक्षा रोजगार के दरवाज़े खोलों
फिर बताओं देश के अच्छे हालात रे !

घृणा के सांप आस्तीन नापे
मुगालते में ना रहे कोई रे !
रगों में लहू की जगह ज़हर
नजरिये से बने ऐसे हयात रे !

तालीम पर हुकूमत का साया
सबक मत करो ज़मींदोज़ रे !
संघर्ष है वक्त की आवाज
दबा कर मत करो बलात् रे !

आओ हम ऊंच – नीच भूला कर
सारे जहां से अच्छा स्वराष्ट्र बनाये रे !
नानक , फूले , भगत सिंह को दें
प्रेम ,भाईचारे की नई सौगात रे !

राकेश आनन्दकर
अजमेर राजस्थान

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