
बहुत पुरानी बात है,
जब शब्द नहीं थे, किताबें नहीं थीं,
न कागज़, न कलम की कोई पहचान थी
तब कहानियाँ हवा में रहती थीं,
अनदेखी… अनसुनी… बस एहसास थीं।
जब कोई हँसता था,
या चुपके से रो लेता था,
जब सपनों में कोई रंग भरता था
तभी तो एक कहानी जन्म लेती थी,
दिल की धड़कनों में चुपचाप बसती थी।
उसी भीड़ में एक कहानी थी,
सबसे अलग… सबसे पुरानी थी,
न राजा-रानी, न खज़ाने की बात
वो “इंसान” की अपनी कहानी थी,
उसके डर, उसके ख्वाब, उसकी बदलती सी जात।
हर युग में वो रूप बदलती,
कभी लोरी बनकर बह जाती,
कभी प्रेम की मीठी धुन,
कभी वीरों की गाथा कह जाती।
पर एक सच हमेशा रहा
वो कहानी कभी खत्म न हुई,
लोग बदलते रहे, समय बीतता रहा,
पर उसकी धड़कन कभी कम न हुई।
फिर एक दिन…
वो हवा से उतरकर ठहर गई,
शब्दों में ढली, कागज़ पर बिखर गई,
उँगलियों ने उसे आकार दिया
और “किताब” बनकर संवर गई।
अब वो सिर्फ महसूस न होती थी,
उसे पढ़ा जाने लगा, समझा जाने लगा,
लोगों ने उसमें अर्थ खोजे,
और हर पन्ने से “ज्ञान” बहने लगा।
ज्ञान ने सोच को दिशा दी,
नज़र को एक नया आसमां दिया,
पर कहीं उस मासूम कहानी ने,
अपना बचपन सा कुछ खो दिया।
फिर एक दिन…
एक बच्चे ने किताब उठाई,
शब्दों के पीछे की धड़कन सुन पाई,
उसकी मुस्कान में वो कहानी लौटी
आँखों की चमक में फिर से खिल आई।
और उसी पल, ये सच जगमगाया
ज्ञान फिर से कहानी बन पाया।
क्योंकि…
जब कहानी दिल से गुजरती है,
तो वो ज्ञान बन जाती है,
और जब ज्ञान दिल को छू ले
तो फिर एक कहानी बन जाती है।
यही सिलसिला यूँ ही चलता है
कहानी से किताब…
किताब से ज्ञान…
और ज्ञान से फिर एक नई कहानी बनता है।
आर एस लॉस्टम












