
कभी आँसुओं से तो कभी प्रेम से,
सबको अपना बनाने वाली।
कभी गुस्से में आसमाँ,
सर पर उठाने वाली।
सोलह श्रंगारों से सजने वाली।
देवी की मूरत सी लगने वाली।
कभी सीता सी मर्यादाओं वाली।
कभी राधा सी निः स्वार्थ प्रेम की डाली।
अनुसुइया बन देवों को,
पवित्र प्रेम सिखलाने वाली।
रघुवर की चरण धूलि को पाकर,
पुनः नारी बन जाने वाली।
त्रेता और द्वापर युग बीता,
फिर आई कलियुग् की बारी।
कलियुग में एक वक़्त पर,
नारी थी थोड़ी सी हारी।
आत्म्बोध जब हुआ नारी को,
नहीं रही फिर वो बेचारी।
इस कलियुग में देख रहे हम सब,
नारी की जिम्मेदारी।
लेकिन एक बात कहे नारी ,नारी से।
तू एक देवी की मूरत है,
संस्कारों को हर पीढ़ी में लाने वाली।
अहंकार से दूर तू रहना,
तू है प्रेम सुधा बरसाने वाली।
स्वार्थ परख तू कार्य न करना,
तू है स्वयं फलों की डाली।
पाश्चात्य संस्कृति को खुद पर,
मत होने देना तू हावी।
क्योंकि तू ही तो है हर युग में,
देवों को अपनी कोख़ में रखने वाली।
श्रीमती सुनीता बोपचे, सिवनी (म प्र)













