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गीत


मोहन आना कभी फुर्सत से, तू मेरी ढाणी गांव रे
बैठकर दोनो बाते करेगे, नीम की ठंडी छाव रे।।


जब से गए हो देवता, नही मिला मेरे मन को चैन रे
याद में रोती रही, रोई नही ऐसी कोई रेन रे
बावरी बनके जोगनभटकी,कभी इस कभी उस गांव रे……


सखी सहेलियां ताना मारे,मोहन नजर नही आए रे।।
घूमा फिराकर मुझसे पूछे, चल जाती उनकी दांव रे …..


कभी छुपाई बांसुरी तेरी, कभी मोड़ भी चुराया रे
मेरे प्रेम को तू बावरा,अबतक समझ नही पाया रे।
क्यों अकेला छोड़ चला गया, तू खुद ही दूसरे गांव रे….


याद आते निधिवन के दिन, केसे गुजरे तेरे बिन रे।
याद में तेरी जिया तड़पे,बिन पानी जैसे मीन रे।।
प्रेम ताप में तन जले रै,मुझे आना तेरी छांव रे..


हाथ जोडकर करू बिनती,बस एक बार आजा गांव रे
मेरे मन की तुझासे कह लूं, मेरे अनकहे प्रेम भाव रे
दुबारा कहूं तो मत आना, तू रहना अपनी ठाव रे


गीतकार मनोहरसिंह चौहान मधुकर
जावरा जिला रतलाम मध्य प्रदेश

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