
विधा: एकांकी नाटक
पात्र:
सास (कठोर स्वभाव)
बहू – सुशील, पढ़ी-लिखी
ससुर – शांत, समझदार
नौकर
दृश्य:1
सुबह का समय। घर का आंगन। सास पूजा करके लौट रही हैं। नौकर ट्रे में चाय लेकर बहू के कमरे की ओर जाता है।
नौकर: (दरवाज़ा खटखटाकर)
बहूजी, चाय ले आइए।
बहू: (अंदर से)
हाँ, रख दीजिए।
(बहू चाय लेकर बैठकर पीने लगती है। तभी सास अंदर आती हैं।)
सास: (गुस्से में)
ये क्या देख रही हूँ मैं! अभी तक सो रही थीं? नहा-धोकर पूजा तो दूर, उठकर सीधे चाय पी रही हो! यही संस्कार लेकर आई हो अपने मायके से?
(बहू शांत रहती है, धीरे से उठती है।)
बहू:
माँजी, एक मिनट… (कमरे में जाती है)
(सास गुस्से में इधर-उधर टहलती हैं। ससुर अखबार पढ़ते हुए यह सब देख रहे हैं।)
(बहू वापस आती है, हाथ में एक लंबी सूची होती है।)
बहू:
पिताजी… (ससुर को देती है)
ये वो सूची है, जो शादी से पहले मेरे पापा को दी गई थी।
(ससुर चौंककर सूची देखते हैं।)
ससुर:
(धीरे से) ये क्या है बहू?
बहू:
इसमें फर्नीचर, गहने, गाड़ी, इलेक्ट्रॉनिक्स… सब कुछ लिखा है।
मेरे पापा ने अपनी हैसियत से बढ़कर सब कुछ दिया।
(थोड़ा ठहरकर, शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में)
बहू:
लेकिन इस सूची में कहीं “संस्कार” नहीं लिखा था, पिताजी…
(सास चुप हो जाती हैं।)
बहू:
माँजी, मैं देर से उठी — ये मेरी गलती है, मैं मानती हूँ।
लेकिन संस्कार सिर्फ सुबह जल्दी उठने से नहीं होते…
संस्कार होते हैं — सम्मान देने में, समझदारी में, और दूसरों की भावनाओं को समझने में।
(ससुर गंभीर होकर सास की ओर देखते हैं।)
ससुर:
सुन रही हो? बहू गलत नहीं कह रही।
संस्कार सिखाए नहीं जाते… जीकर दिखाए जाते हैं।
(सास का गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो जाता है।)
सास: (धीरे से)
बहू… शायद मुझसे ही गलती हो गई।
मुझे तुम्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए थी।
बहू: (मुस्कुराकर)
कोई बात नहीं माँजी, हम दोनों मिलकर एक-दूसरे से सीखेंगे।
(सास बहू के सिर पर हाथ रखती हैं।)
सास:
अब चलो, साथ में चाय पीते हैं… और हाँ, कल से मैं भी तुम्हारे साथ थोड़ा देर से उठ जाऊँगी।
(सब हल्का-सा मुस्कुराते हैं।)
पर्दा गिरता है
संदेश:
संस्कार केवल परंपराओं का पालन नहीं, बल्कि व्यवहार, समझ और सम्मान का नाम है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार












