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खुद के दुख का कारण

खुद के दुख का कारण केवल अनगिनत चाह होती है।
हर समय दूसरों में झाँकने के कारण ही आँखें रोती हैं।।

हमें सदैव स्वयं के भीतर ही देखना चाहिए।
दूसरों को ज़रा कम ही परखना चाहिए।।
कड़ी मेहनत का स्वाद चखना चाहिए।
सबका आदर-मान अवश्य करना चाहिए।।

अपनी कष्ट या पीड़ा को न सुनाया जाए।
दुखों को सबके समक्ष न बताया जाए।।
कोशिश करने पर ही शोर न मचाया जाए।
कामयाबी के बढ़ते कदमों को न रोका जाए।।

कुछ पाने के लिए आखिर कुछ तो खोना पड़ता है।
सूर्य बन कर चमकने हेतु तम से लड़ना पड़ता है।।
ज़िद्द और जुनून जगाने की खातिर जंग करना पड़ता है।
सभी हों हमारे संग इसलिए खुद को ही आज़माना पड़ता है।।

अपनेआप पर किया गया विश्वास नहीं तोड़ना चाहिए।
खुद को तराशने का सुनहरा अवसर नहीं छोड़ना चाहिए।।
कानों में मिश्री के समान मीठेपन का अहसास घोलना चाहिए।
स्वयं को हर बार प्रत्येक कार्य करने के लिए बोलना चाहिए।।

खुद के दुख का कारण बनने से बचा जाए।
ऐसे चरित्रवान बन कर सबको जचा जाए।।

शिक्षिका, कवयित्री, लेखिका, समाजसेविका-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)

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