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माना कि देश चलाते हों

विषय- कर्मो का हिसाब
विधा- कविता
शीर्षक- माना कि देश चलाते हो

माना कि देश चलाते हो,
तुम करो जरा वफादारी।
जब खाता खुलता है पाप पुण्य का,
तब देखी जाती है भागीदारी।

नेता हो राजनेता हो या हो कोई अधिकारी,
कहने को नाम बड़े हैं पर,
हैं तो ये भी कर्मचारी।

देखा है दूर से मैंने ,
इन नामों की चमकदारी।
बहुत से लोग लगे होते,
करने इनकी पहरेदारी।

इनमें से बहुत सो को,
करते देखा है ग़द्दारी।
इनमे से कुछ एक को,
करते देखा है वफादारी।

करते हैं बात अब पहले,
उन कुछ वफ़ादारों की।
जिनके चेहरों पर चमक है,
मातृभूमि का ऋण चुकाने की।

छाती भी चौड़ी रहती है,
जब बात आती है,
गद्दारों से लड़ जाने की।
जरा देखो बलिष्ठता तुम,
उनकी भुजाओं की।
दुश्मनों का सर अलग करने,
लिए हथियार हाथों में,
जो हर वक़्त ड टी रहती।

जरा देखो ताकत उन पैरों की,
जो न थकते हैं न कपते हैं।
हर मौसम की मार को सहकर,
न कभी थकते हैं न रुकते हैं।
आँखों में विजय की आस लिए,
माँ से ज्यादा धरती माँ के लिए,
सदा समर्पित रहते हैं।

ये ना तो कोई नेता हैं ,
ना राजनेता हैं।
ना ही कोई अधिकारी कहलाते हैं।
हम सब इन्हें फौजी,
या तो सिपाही कहते हैं।

माना कि कुछ ने पढ़ी थ्यौरी,
प्रेक्टिकल बिन है तैयारी अधूरी ,
माना की देश चलाते हो,
तुम करो जरा वफादारी।

राजनीतिज्ञ हैं देश चलाते पर,
कोई डोर उन्होंने है थामी।
कुछ देश चलाने वालों में,
हनुमान ने शक्ति है डाली।

आसान नहीं थी इतनी भी,
प्रभु श्रीराम के मन्दिर की तैयारी।
कुछ देश चलाने वालों में,
हनुमान स्वयं जीवंत हुए।
सत्ता की गदा को लिये हाथ,
राम काज संपन्न किये।

प्रभु अपने अब महल आ गए,
अब दुष्टों की है बारी।
समय चक्र का यही खेल,
पड़ता है हर युग में भारी।
सत्य कर्म और न्याय पर चलती,
हर युग में ये दुनिया सारी।

पाप कर्म और दुष्टता,
जब हद से ज्यादा बढ़ जाती।
तब करते हैं प्रभु स्वयं,
धरती पर आने की तैयारी।

नेता राजनेता हो ,
या हो कोई अधिकारी।
जब खाता खुलता है कर्मो का,
तब देखी जाती है,
पाप पुण्य में भागीदारी।

माना कि देश चलाते हो तुम करो जरा वफादारी।

हैं कुछ राजनेता ऐसे भी,
जो प्रभु की आज्ञा से चलते हैं।
प्रभु की आज्ञा को पाकर,
देश हित में कार्य वो करते हैं।

लेकिन कुछ देश विरोधी भी,
इनके बीच छिपे बैठे हैं।
अनीति से जो कमाया,
पद प्रतिष्ठा नाम और पैसा।
जरा सोचो रास आयेगा,
तुमको ये कैसा।

जब ये गद्दी छीन जायेगी,
देख बुढ़ापा लाठी पास आयेगी।
पैर भी थर थर कापेंगे,
हाथों में बस निवाला उठाने ,
इतनी ताकत बाकी होगी।
फिर ये दुनिया तुमको धिक्कारेगी,
मौत से पहले ये जिन्दगी,
तुमको मारेगी।

अभी समय है खुदको बदलो,
कर लो नवजीवन की तैयारी।
सात पुस्तों के लिए कमाना छोड़ो,
अपनी आँखों को ह्रदय में मोड़ों।
ये पुस्ते नहीं साथ चलेंगी।
सिर्फ तुम्हें जलाने की तैयारी करेंगी।

साथ जायेंगे कर्म तुम्हारे,
अब तो है कर्मो की बारी।
कर्म किया जो वो भोगोगे,
पाप पुण्य सब बारी बारी।
माना कि देश चलाते हो,
तुम करो जरा वफादारी।
जब खाता खुलता पाप पुण्य का,
तब देखी जाती है भागीदारी।
(कटु सत्य)
(युग परिवर्तन की वेला है चलना जरा संभल के)

रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)

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