
है “पाक” की मंशा पाक नहीं
नीयत भी उसकी साफ नहीं
कश्मीर पर उसकी गिद्ध दृष्टि
कर सकते उसको माफ नहीं।
कश्मीर की रट चौबीस घंटे
मुद्दा है उसका खास यही
ऐसे पाक पर कभी भी हम
कर सकते हैं विश्वास नहीं ।
सरहद पर आतंकी भेजे
और लड़ना चाहे छद्म युद्ध
छद्म युद्ध को बोले धर्म युद्ध
बुद्धि है उसकी नहीं शुद्ध ।
उसकी तो यह है कुटिल चाल
भारत मां का ना झुका भाल
वो जब जब भी टकराएगा
उल्टे मुंह की ही खायेगा ।
वह हारा हमसे तीन जंग
फिर भी ना उतरा उसका रंग
बेशर्मी की है हद होती
रुह उसकी आज कहां सोती?
स्वरचित, मौलिक रचना
नागेन्द्र त्रिपाठी
गाजियाबाद / वाराणसी
उत्तर प्रदेश












