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स्त्री होना ही एक उच्च पदवी है

स्त्री का मन अथाह सागर की तरह है , जिसमें भावभीनी लहरें उछलती कूदती रहती हैं । ये लहरें खुबसूरत दिखती हैं जब किनारे से खेलती है , किंतु जब किनारे को तोड़ कर आगे बढ़ती है तो विनाशकारी साबित होती हैं ।
जैसे सागर से हमें बहुत कुछ मिलता है, भोजन, औषधि, ईंधन, मोती वगेरह, ऐसे ही स्त्री किसी के जीवन को समृद्ध करने वाली होती है ।
स्त्री माया का पथ है, यह मुक्ति का मार्ग नहीं ,
स्त्री न होती तो जग में, रिश्तों का कोई मोल न होता ।।
हर समय कहीं कोई भी आवश्यकता हो घर में चाहे वह रिश्ते निभाने की बात हो या बच्चों में संस्कार डालने की, पुरुष स्त्री की ओर ही देखता है । क्योंकि इस कार्य में वह निपुण है । फिर चाहे किसी रूठे को मनाना हो , स्त्री की मीठी वाणी चुटकियों में मना ही लेती है । चाहे सरहद हो या संग्राम नाजुक दिखने वाली यह स्त्री रण चंडी बन जाती है, और दुश्मनों के दांत खट्टे कर देती है । पूर्णतः सक्षम है, स्त्री ।
कौन है जिसने इन्हें बांध रखा है?
किसमें ताकत है जो अथाह सागर को बांध सके!! जैसे अशोक वाटिका में हनुमान जी ने ब्रह्मास्त्र को तोड़ देने की क्षमता होने के बावजूद स्वयं ही, ब्रह्मा जी के सम्मान को बनाए रखने के लिए , बंधक बनना स्वीकार किया । वैसे ही स्त्री ने सम्मान रखते हुए स्वयं को बंधन में बांध लिया ।
तभी तो वह एक ऐसी पदवी पर है जहां उसे देवी का रुप माना जाता है । तभी तो वह सम्मान के पात्र है । इतनी जिम्मेदार पदवी पर होते हुए गैर जिम्मेदाराना हरकत माफ़ नहीं हो पाती । शायद तभी स्त्री की भूल को माफ़ नहीं किया जा सकता है। जबकि स्त्री का हृदय इतना उदार होता है कि वह हर भूल माफ़ कर देती है , यह मानते और समझते हुए कि जीना इसी का नाम है ।
स्त्री चरित्र पर सवाल
ये नियम किसने बनाएं और क्यों बनाएं हैं? अब इन्हें बदलाव की आवश्यकता है, स्त्री के लिए एक स्वस्थ मानसिकता की आवश्यकता है , आज समाज को । आदिकाल से स्त्री के चरित्र पर ऊंगली उठती ही रही है , स्वयं राम को अवतार लेकर , पुरुष समाज को मर्यादा में रहना उत्तम है , यह सिखाना पड़ा ।
अंत में यही कहुंगी,
आप बेटी को घर भर के सामान दिला सकते हैं, सम्मान नहीं । बेटी को आप सक्षम बनाएं, सम्मान वह खुद कमा लेगी ।

दीपिका मानवानी
गुजरात

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