
मैं एक आम इंसान हूँ। नाम छापना ज़रूरी नहीं, क्योंकि ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं है। ये हर उस शख्स की है जो कचहरी के चक्कर काटते-काटते थक गया है, पर कभी इंसाफ़ की दहलीज़ तक नहीं पहुँच पाया।
साल था 2014। मेरी बहन की शादी बड़ी धूमधाम से हुई थी। हमने हैसियत से ज़्यादा दहेज दिया—गाड़ी, सोना, नकद। सोचा, बेटी खुश रहेगी। छह महीने भी न बीते थे कि ससुराल वालों की माँग बढ़ने लगी। “प्लॉट लेना है, 10 लाख और चाहिए।” बहन ने मना किया तो मारपीट शुरू। एक रात खबर आई—बहन अस्पताल में है। शरीर पर जलने के निशान लगे थे। उसने कहा, “तेल का स्टोव फट गया।” पर उसकी आँखें कुछ और ही कह रही थीं।
हमने हिम्मत करके 498A और दहेज-हत्या की कोशिश का केस किया। FIR हुई, पति दो दिन जेल में रहा, फिर ज़मानत पर बाहर आ गया। यहीं से मेरी ‘इंसाफ़ की अधूरी कहानी’ शुरू हुई।
पहली तारीख़। जज साहब ने अगली तारीख़ दे दी—“गवाह नहीं आए।” दूसरी तारीख़। “सरकारी वकील छुट्टी पर।” तीसरी तारीख़। “समन तामील नहीं हुआ।” हर तारीख़ पर मैं गाँव से 80 किमी दूर जिला कोर्ट आता। एक दिन की दिहाड़ी जाती, वकील की फीस अलग, ऊपर से ससुराल वालों की धमकियाँ। बहन सहमी-सहमी जीती रही। समाज कहता रहा —“समझौता कर लो, लड़की का घर बस जाएगा।” साल दर साल बीत गए। बहन के दो बच्चे हो गए। बच्चे स्कूल जाने लगे, पर केस अभी भी “गवाही” पर अटका था। गवाह कौन बने? पड़ोसी कहते—“हमें कोर्ट-कचहरी नहीं चाहिए।” बहन की सास कहती—“बहू ने खुद आग लगाई।” मेडिकल रिपोर्ट में ‘जलन 40%’ लिखा था, पर पुलिस की चार्जशीट कमज़ोर बना दी गई।
2020 में कोरोना आया। कोर्ट बंद। दो साल और निकल गए। इस बीच ससुराल वालों ने गाँव में पंचायत बैठाई। फैसला सुनाया—“5 लाख ले लो, केस वापस ले लो।” मेरे बूढ़े पिता टूट गए। बोले—“बेटा, इंसाफ़ से ज़्यादा ज़रूरी बेटी की ज़िंदगी है।” पर बहन ने मना कर दिया। वो कहती थी—“पापा, अगर मैं चुप रही तो कल किसी और बहन को जलाएँगे।”
2023। केस को 9 साल हो गए। 47 बार तारीख़ लग चुकी थीं। आखिरी सुनवाई में जज ने कहा—“सबूत पर्याप्त नहीं है। संदेह का लाभ अभियुक्त को मिला।” पति बरी हो गया। कोर्ट से बाहर निकला तो उसने मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया। वो मुस्कान आज भी मेरे सीने में कील की तरह धँसी है। बहन अब मेरे साथ रहती है। बच्चे पूछते हैं—“मामू, पापा क्यों नहीं आते?” मैं क्या जवाब दूँ? कानून की किताब कहती है—“इंसाफ़ में देरी, इंसाफ़ से इनकार ही नहीं अपितु इंसाफ़ की हत्या है।” मेरी बहन को देरी नहीं, पूरी ज़िंदगी का इनकार मिलेगा।लोग कहते हैं—“कानून अंधा होता है।” मैं कहता हूँ—काश अंधा होता। हमारा कानून तो देखता सब कुछ है, पर सदैव खामोश रहता है। फाइलों का वज़न इंसान के दर्द से ज़्यादा हो जाता है।
मेरी कहानी अधूरी है क्योंकि इंसाफ़ अभी भी अधूरा है। बहन के हाथ पर जले के निशान अभी भी मिटे नहीं हैं। हर सर्दी में दर्द करते हैं। वो निशान हमसें पूछते हैं—“इंसाफ़ कब पूरा होगा?”
मैं स्वयं नहीं जानता। पर इतना अवश्य जानता हूँ—जब तक एक भी बहन दहेज की आग में जलेगी, जब तक एक भी गरीब को तारीख़ पर तारीख़ मिलेगी, तब तक इस देश की इंसाफ़ की किताब का आखिरी पन्ना खाली रहेगा।
और मेरी कहानी? वो तब पूरी होगी जब कोई और बहन कोर्ट के बाहर आकर ये न कहे—“भैया, हम हार गए। आज बहन सिलाई सीख रही है। कहती है—“अपने पैरों पर खड़ी होऊँगी। यही मेरा इंसाफ़ होगा।” शायद सच्चा इंसाफ़ कोर्ट में नहीं, हौसले में मिलता है। फिर भी, एक सवाल रह जाता है—क्या सिस्टम भी कभी जवाब देगा? या यूं ही शांति से तमाशा देखता रहेगा।
मुन्ना राम मेघवाल ।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।













