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गजल


काफिया — आ की बंदिश
रफ़ीद — रहे

2122—2122—2122–212=26
आज क्या हम लोग सारे शांति मन में पा रहे।
जी रहे जीवन कृत्रिम हम शान ही दिखला रहे।

भूलकर अपनापन सभी लिप्त है बस अहम में,
दो किताब पढ़कर नीम हकीम बनकर छा रहे।

दूरियाँ बढ़ती गई नजदीक आकर भी यहाँ,
भीड़ में तन्हा सभी खुद से अलग बिसरा रहे।

वक्त की आँधी चली अपनी जड़ों से कट रहे,
छोड़ कर संस्कार हम अंधी दिशा में जा रहे।।

सत्य का पथ “सुरभि”छोड़ा झूठ के पीछे चले,
भीतर रहे सूख से काँटा मगर पछता रहे।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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