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बेफिक्र हूं इसलिए

बेफिक्र हूं इसलिए कि आईना सा किरदार है मेरा।
फिक्र उन्हें होती है अक्सर,
जिनके चेहरे पर लगा होता एक और चेहरा।
यहाँ रहकर क्यों करना है तेरा मेरा।
न जाने कब सबकुछ ले जाए कोई लुटेरा।
कंचन सा तराशा है व्यक्तित्व मेरा।
तभी तो न बदलता रंग वह अपना,
चाहे हो उजली किरण या हो अंधेरा।
जिसके चलते कई बार,
मुझे मुसीबतों ने है आकर घेरा।
लेकिन है उसकी मेहरबानी कुछ ऐसी।
न रहता पतझड़ कभी मेरी जिंदगी में ठहरा।।

मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)

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