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नारी की उत्कंठा

कहते नारी है लाचारी, यह कैसा अल्फ़ाज़ है?
सुनती आई दुनिया से, पर मन में हुंकार का आगाज़ है।
जब-जब धर्म-देश पर आई संकट की काली घटा,
शौर्य-बल से पुरुषों को भी मैंने ही विजय-पथ दिखाया।

रुकती नहीं, झुकती नहीं, टूटती नहीं संघर्षों से,
हौसले खुद गढ़े हैं मैंने, रण में विजय पाई बरसों से।
हाँ मैं नारी हूँ, पर कभी लाचारी नहीं,
न मैं अबला हूँ, न बेचारी कहीं।

आ जाऊँ अपने पर तो लक्ष्मी-दुर्गा-काली बन जाती हूँ,
इतिहास साक्षी है, सदा पुरुषों की सारथी कहलाती हूँ।
नज़र से नज़रिया बदला, दर्पण से दर्शन बन गई,
बेटी से माता बनी, सीता बनकर भी तपती रही।

कर्म से कर्तव्य-पथ पर चली, धर्म की ध्वजा उठाई,*
गर्व से कहती हूँ जग से — मैं नारी स्वाभिमानी कहलाई।
स्वाभिमान से सदा हुंकार भरती, शीश नहीं झुक पाया,
हाँ मैं नारी हूँ, युग बदलने की ताकत संग लाई।

राजेश्वरी बाजपेई
जबलपुर (म.प्र.)

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