
मृत्यु लोक है जगदीश्वर माया
आत्मा ओढ़े तन-मन काया
माया हाला पी कर जीव मन भरमाया
जिसे स्वयं रचयिता लाया
मैं मैं करता जीव अकुलाया
छल-प्रपञ्च से–
परलोक नसाया।
नहीं सत्कर्म
बस असत्य प्रलाप से प्रपंच रचाया
मन अभिभूत हुआ कलिकाल की छाया
मानव जन्म मिला और झूठी काया
आत्मा जाने सत्य– छल-प्रपञ्च से भेद छुपाया।
इस जग अतृप्त आत्माएं
हैं भव सागर
जन्म-मरण के चक्कर में
मृत्युलोक में भूल गए
कल क्या था यहां आ कर ।
उपनिषद कहें, कहे भगवद्गीता
जो कर्म किये मिलेंगे फल
डूब गया कलिकाल की छाया
अंतर्मन को ले ज़रा टटोल
बहुत नहीं अब लंबी दौड़
हे जीवात्मा ! प्रायश्चित से मुंह न मोड़
सत्य से कैसी होड़।
महेश शर्मा –करनाल










