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आचरण


आचरण ही वह दर्पण है,
जहाँ प्रतिबिंब तुम्हारा बनता है।
अज्ञानी का यही आचरण,
उसे प्रताड़ित करता है।

सुंदर और पवित्र आचरण,
मानव को कुलीन बनाता है।
मूर्ति और चित्र से ज्यादा,
यह उच्च कोटि का होता है।

जिसका हो पशु तुल्य आचरण,
पशुओं से नीचे गिर जाता है।
दूजे से करो वही आचरण,
जो दिल दूजे से चाहता है।

यदि चाहते तुम आत्म प्रसंशा,
कर्म भी वैसा किया जाता है।
छोटी छोटी बातों पर दूजे का,
आभार प्रकट किया जाता है।

जैसी करनी वैसी भरनी,
सबसे यही कहा जाता है।
लेकिन स्वयं की गलत करनी को,
श्रेष्ठ कार्य कहा जाता है।

आत्म प्रसंशा दूजे की निंदा,
घ्रणित कार्य ये कहलाता है।
करता इंद्र स्वयं की प्रसंशा,
अपनी लघुता दर्शाता है।

अहंकार हो चाहे जैसा भी,
विनाश साथ लिए आता है।
धर्म का सार ह्रदयंगम कर
आत्मा को अनुकूल बनाता है।
आचरण ही वह दर्पण है,
जहाँ प्रतिबिंब तुम्हारा बनता है।
( पाठकों के अनुरोध पर)
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)

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