
” कविता को कहते रहने से, आगे अब तुम बढ़ जाओ “
“कविता को बस लिखो नहीं ,तुम अपनी कविता स्वयं बन जाओ।”
दुख किसे नहीं इस दुनिया में, तुम दुख का रोना क्यो रोते हो।
छोटी छोटी बातों पर रोकर, रोने का ढोंग रचाते हो।
जिसके जीवन में दुख कम होता है,
वही रोने का ढोंग रचाता है।
जिसने जीवन में ,सच में दुखों को देखा है,
दुःख से लड़ने की सामर्थ्य जगाकर,
आँसू को उसने रोका है।
दुःख में रोने वाले जरा बताओ,
इतना समय कहाँ से लाते हो।
दुःख किसे नहीं इस दुनिया में,
तुम दुःख का रोना क्यों रोते हो।
जिस पल अर्जुन रण में दुःखी था,
उस पल स्वयं भागवान कृष्ण ने,
धर विराट रूप सुनाई गीता।
अब वो गीता हर घर में है,
क्यो गीता का ज्ञान समझ नहीं आता।
रोते रहते यदि राम प्रभु, लंका विजय क्या वो कर पाते।
रावण से लड़, सोने की लंका से, क्या माता सीता को ले आते।
अपनी इन आँखों के समुद्र पर, क्यों धीरज का पुल नहीं बांधते हो।
दुःख किसे नहीं इस दुनिया में, तुम दुःख का रोना क्यों रोते हो।
दुःख जाकर उस इंसान से पूछो,
जिसने अपनी संतान को खोया है।
तड़प रहे उन माता पिता ने कैसे
अपने दुःख को छुपाया है।
दुःख दर्द अगर ज्यादा हो जीवन में,
जघन्य कर्म कर दुनिया में तुम,
दुःख दर्द से ऊपर उठ जाते हो।
दुःख किसे नहीं इस दुनिया में,
तुम दुःख का रोना क्यों रोते हो।
छोटी छोटी बातों पर रोकर,
रोने का ढोंग रचाते हो।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)











