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कर्म कर, फल की इच्छा न कर

पक्षी तो बिना किसी नक़्शे के
अपने गंतव्य तक पहुँच जाते है,
पर हम इंसान दिल से दिल तक
पहुँचने में प्राय: नाकाम रहते हैं।

किसी के दिल तक पहुँचने में,
कामयाब होना आसान नहीं है,
हाँ, दिल दिल से मिल जाते हैं जब,
नक़्शे की ज़रूरत नहीं पड़ती है तब।

दिल नहीं मिले पर बंधन बंध गया,
स्त्री से पुरुष का गठबंधन हो गया,
तू-तू, मैं-मैं में किसी का भाग्य फूटा,
किसी का ज्योतिष से विश्वास टूटा।

यहाँ तो जो फेल हुआ वो फेल हुआ,
पर ज्योतिष शास्त्र फेल हुआ या नहीं,
यह कौन बतलाएगा, बात कर्म की है,
कि वह सचमुच में फूटा भी है या नहीं।

श्रीकृष्ण जी ने गीता में कहा है,
कर्म कर, फल की इच्छा न कर,
आदित्य निरन्तर कर्म करते रहो,
देखो अपना भाग्य भी बदल कर।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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