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मां की लिखावट

माँ के लिए क्या लिखूँ मैं,
माँ की ही तो लिखावट हूँ मैं।
उसकी दुआओँ की स्याही से,
सजी हुई एक इबारत हूँ मैं।

जब-जब जीवन थक जाता है,
माँ आँचल बन छा जाती है,
सूखे मन की हर डाली पर,
ममता बनकर आ जाती है।

मेरे शब्दों की मिठास में,
माँ की बोली का असर है,
मेरी हर छोटी सफलता में,
उसकी तपस्या का सफर है।

मैं जो भी हूँ, जैसा भी हूँ,
माँ के सपनों का अंश हूँ मैं,
उसके दिल की धड़कन में बसता,
एक प्यारा-सा वंश हूँ मैं।

दुनिया चाहे कुछ भी कह दे,
माँ मेरा अभिमान रही,
मेरी हर कविता की पहली
और अंतिम पहचान रही।

माँ की ममता ईश्वर जैसी,
निर्मल, पावन, सच्ची है,
मैं तो बस उसकी उँगली थामे
चलती एक छोटी बच्ची हूँ।

प्रोफेसर सुषमा देवी
संस्कृत विभाग
जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू

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