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सृजन की सुन्दरता


विधा:- कुंडलियाँ छंद

सुंदर शब्दों भाव से,
बनता सृजन महान।
भाषा में माधुर्यता,
मात्रा उचित विधान।।
मात्रा उचित विधान,
पाठक के दिल छू जाए।
हो उद्देश्य महान,
राष्ट्र हित सबको भाए।।
कहि प्रशांत बतलाए,
दिशा और मर्म हो अंदर।
मानव हित उद्गार,
सृजन बन जाय सुंदर।।

भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश

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