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लुप्त हो गए

बढ़ती जनसंख्या में भईया,
देहरी-आंगन लुप्त हो गए…!

जहाँ कभी तुलसी थी मुस्काती,
जहाँ दादी चौखट पर थी गाती,
उस घर के अपनेपन वाले
सब चेहरे ही लुप्त हो गए…!

बारी झाड़ी कहीं न दिखती,
सब्ज़ी की वो क्यारी न दिखती,
टंकी भरती मोटर से अब,
कुएँ-तालाब सब लुप्त हो गए…!

पानी तो है घर-घर लेकिन
सुन्दर नहीं अब वाणी रही
प्यास बुझाने वाले रिश्ते
धीरे-धीरे लुप्त हो गए…!

जब से बिटिया देहरी लांघी,
संस्कारों का पतन हो गया,
फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टा में,
लाज-शरम सब लुप्त हो गए…!

आया दौर अधूरे कपड़ों का,
अंग प्रदर्शन फैशन ठहरा,
आँखों की वो झुकती मर्यादा
जाने कब से लुप्त हो गए…!

नंगेपन की इस दुनिया में
पश्चिम वाला रंग गहराया…
दुपट्टे, आँचल, घूँघट वाली
संकोच सारे अब लुप्त हो गए…!

हरियाली भी सूख गई है,
चिड़ियों की अब चहक नहीं,
धरती में वो महक नहीं है,
पीपल,बरगद लुप्त हो गए…!

बिल्डिंग पर बिल्डिंग है उगती,
कंक्रीटों का जंगल फैला है,
छाँव बाँटने वाले पेड़ अब
धीरे-धीरे लुप्त हो गए…!

मोबाइल का ज़माना है आया,
चिट्ठी की बेकरारी गई,
मिलने वाली वो तड़पन भी
जाने कहां अब लुप्त हो गए…!

वीडियो कॉलों के रिश्तों में
दिल की धड़कन कम हो गई,
संवेदनाओं के सारे धागे
जाने कब से लुप्त हो गए…!

अब तो खाते पैकेट वाला,
पेड़ों पर चढ़ना भूल गए,
गुल्ली-डंडा, दौड़, कबड्डी,
बचपन के खेल लुप्त हो गए…!

मोबाइल में व्यस्त हुए तो
मैदानों ने रोना सीखा,
मिट्टी से जो नाता था वो,
धीरे-धीरे लुप्त हो गए…!

ईंट-पत्थरों के मकानों में,
खपरैल वाली सुकून कहां,
अपनेपन का व्यवहार नहीं अब
दिल ईमान सब लुप्त हो गए…!

अपनापन भी खो दिए हम
दिल का सौदा होने लगा,
ईमान और सच्चाई वाले
सब किस्से ही लुप्त हो गए…!

दादी-नानी दूर हो गईं,
परियों वाली रात नहीं,
बचपन की वो बात नहीं अब,
चंपक, नंदन लुप्त हो गए…!

गेमों वाली दुनिया में अब
बच्चा खुद में कैद हुआ,
कहानियों के मीठे मौसम,
धीरे-धीरे लुप्त हो गए…!

गाँवों को हमने शहर बनाया,
मॉडर्न होने का धर्म निभाया,
नल से घुट-घुट स्नान करते,
ताल-तलैया सब लुप्त हो गए…!

सुविधाएँ तो खूब मिलीं पर
मन का सुकून कहीं खो गया,
विकास की अंधी दौड़ में देखो,
इंसानियत ही लुप्त हो गए…!

घर बड़े हुए, पर मन छोटे हुए,
सपने ऊँचे हुए, रिश्ते कम हुए,
तरक्की की इस चमक में आखिर
कितने अपने लुप्त हो गए…!!

सोच रहा हूँ बैठ अकेला,
क्या पाया, क्या खो आए…
दुनिया जीतने निकले थे हम,
सपने सारे लुप्त हो गए…!

रवि भूषण वर्मा

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