
चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी द्विवेदी युग के प्रतिनिधि लेखक तथा सशक्त कथाकार थे। इन्हें' दादा ठाकुर 'के नाम से जाना जाता है, हास्य कविताओं के जाने-माने संगीतकार,लेखक ,प्रकाशक और सामाजिक आलोचक थे।
पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म 7 जुलाई 1883 में पुरानी बस्ती, जयपुर में हुआ था। हिंदी के हिंदी, संस्कृत,प्राकृत और पाली के लेखक और विद्वान थे। इनकी माता का नाम लक्ष्मी देवी और पिता का नाम पंडित शिवराम शास्त्री था। इनके पिता हिमाचल प्रदेश के गुलेर गांव से थे, इसलिए उन्हें" गुलेरी" कहा जाता है।
गुलेरी जी को बचपन से ही घर में संस्कृत भाषा, वेद और पुराण आदि का अध्ययन एवं पूजा -पाठ का वातावरण मिला। भाषा के ज्ञान और भाषण में निपुण हो गए थे।
गुलेरी जी बहुभाषाविद् थे। गुलेरी जी एक लेखक होने के साथ ही पत्रकार व अध्यापक भी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन साहित्य की साधना में लगा दिया। हिंदी साहित्य की सभी विधाओं में उन्होंने साहित्य का सृजन किया। उनकी कहानी ‘उसने कहा था’हिंदी कथा साहित्य में ‘मील का पत्थर ‘साबित हुआ। हिंदी साहित्य जगत में सबसे पुरानी कहानी मानी जाने वाली ‘उसने कहा था’के संवाद आज भी दिलों -दिमाग पर छाए रहते हैं। गुलेरी जी के द्वारा संपादित पत्र ‘समालोचक ‘था। समालोचक आगरा से प्रकाशित होने वाला हिंदी का पत्र है। समालोचक पत्र का स्तर ‘सरस्वती ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका ‘तथा इंदु आदि पत्रिकाओं के समान ही ऊंचा था।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी की रचनाओं को विद्यालय व बी. ए.और एम. ए.के सिलेबस में विभिन्न विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाता है।
गुलेरी जी की शैली मुख्यतः वार्तालाप की शैली होती है जहां वे किस्सा -बयानी के लहजे में मानों सीधे पाठक से मुखातिब होते हैं। वो समय
साहित्यिक भाषा के रूप में खड़ी बोली को संवारने का काल था। कहीं वे’ पृष्णि’ ‘,क्लृपति’और और ‘आग्मीध्र’जैसे अप्रचलित संस्कृत शब्दों का प्रयोग करते हैं तो कहीं’बेर,”बिछोड़ा ‘और और’ पैड़’
जैसे ठेठ लोक भाषा के शब्दों का।
गुलेरी जी अपने लेखन में उद्धरण और उदाहरण बहुत देते हैं। इन उद्धरणों और उदाहरण से आमतौर पर उनका काव्य और अधिक स्पष्ट तथा रोचक हो उठता है। उन्होंने ‘कछुआ धरम’और ‘मारेसी मोहि कुठाऊं”नामक निबंध और पुरानी हिंदी नमक लेखमाला भी लिखी।” महर्षि च्यवन का रामायण”उनके शोधपरक पुस्तक थी। वह खड़ी बोली का प्रयोग अनेक विषयों अनेक प्रसंग में करते थे। शायद किसी भी अन्य समकालीन विद्वान से कहीं बढ़कर। हर संदर्भ में उनकी भाषा आत्मीय तथा संजीव रहती है भले ही कहीं – कहीं वह अधिक जटिल या हल्की क्यों ना हो जाती हो। गुलेरी जी की भाषा और शैली उनके विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं थी।
प्रोफेसर नामवर सिंह का कहना है”गुलेरी की हिंदी में सिर्फ एक नया गद्य या नई शैली नहीं गढ़ रहे थे बल्कि वे वस्तुतः एक नई चेतना का निर्माण कर रहे थे। और नया गद्य नहीं चेतना का सर्जनात्मक साधन है। “अनेक प्रसंगों में गुलेरी जी अपने समय से इतना आगे थे कि उनकी टिप्पणियां आज भी हमें अपने चारों ओर सोचने को मजबूर करती है।
‘ खेलोगे कूदोगे होगे खराब ‘की मान्यता वाले युग में गुलेरी जी खेल को शिक्षा का सशक्त माध्यम मानते थे। बाल विवाह के विरोध और स्त्री शिक्षा के समर्थन के साथ ही आज से
सौ साल पहले उन्होंने बालक बालिकाओं के स्वस्थ चारित्रिक विकास के लिए सह शिक्षा को आवश्यक माना था। धर्म को गुलेरी जी बराबर कर्मकांड नहीं बल्कि आचार विचार, लोक कल्याण और जन सेवा से जोड़ते रहे।
उन्होंने 39 वर्ष की जीवन अवधि में उन्होंने कहानियां ,लघु कथाएं, आख्यान ललित निबंध गंभीर विषयों पर विवेचनात्मक निबंध ,शोध -पत्र ,समीक्षाएं ,संपादकीय टिप्पणियां ,पत्र विधा में लिखी टिप्पणिनियां, समकालीन साहित्य ,समाज राजनीति ,धर्म ,विज्ञान साहित्य ,पुरातत्व, भाषा आदि पर प्रबंध लेख तथा टिप्पणियां लिखीं। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था ‘का प्रकाशन सरस्वती में 1915 में हुआ था।
उनकी निम्नलिखित रचनाएं हैं —
निबंध–कछुआ धाम, पुरानी हिंदी, देवकुल, संगीत , आंख।
कहानियां –सुखमय जीवन, उसने कहा था, बुद्ध का कांटा।
कविताएं–एशिया की विजयदशमी, भारत की जय, वेनांक बर्न, अहित अग्नि, झुकी कमान, स्वागत, ईश्वर से प्रार्थना आदि। पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी को कोटि-कोटि नमन!!
डॉ मीना कुमारी परिहार













