
गांव गांव रहा,
ममता का बस छांव रहा।
घर चबूतरे दिखते अब खाली,
शोर, खेलकुद की आवाजे गूंजती।
पेड़ों की छांव में बैठने वाले कोई नहीं रहे,
पढ़-लिखकर सब शहर में रवाना हुए।
खुले आकाश, सुन्दर घटाओं में जीनेवाले,
ऐसी, कूलर की अब हवा खा रहे हैं।
गांव में थे तो स्वास्थ्य मस्त और स्वस्थ रहता था,
देखो ना, अब बस सेहत से नौटंकी कर फिर रहे हैं।
पैदल, साइकिल की सवारी हुआ करती थी,
शहर में फोर व्हीलर, स्मार्ट व्हेहिकल की अब लाइन लगी।
पुराने दिन हंसी पल के थे,
आज फिर से वहीं जीने को जी करदा।
रचनाकार
दुर्वा दुर्गेश वारीक ‘गोदावरी’ गोवा













