
“मन की बात कह देने से फैसले हो जाते हैं,
मन में रखने से फासले हो जाते हैं…”
परिवार…
सिर्फ एक शब्द नहीं,
जीवन भर का त्याग, संघर्ष और जिम्मेदारियों का दूसरा नाम है।
जहाँ एक व्यक्ति अपनी इच्छाएँ मारकर
दूसरों के सपनों को जीवित रखता है।
घर का मुखिया
कभी पिता बनकर,
कभी पति बनकर,
कभी मजदूर, कभी किसान,
तो कभी मशीन की तरह
दिन-रात चलता रहता है।
उसे बुखार हो,
शुगर हो,
या शरीर दर्द से टूटा हो,
फिर भी वह सुबह उठता है
क्योंकि बच्चों की फीस बाकी होती है,
राशन लाना होता है,
और पत्नी की उम्मीदों का घर
उसके कंधों पर टिका होता है।
वह खुद के लिए
नई शर्ट नहीं खरीदता,
लेकिन बच्चों के लिए
त्योहार पर नए कपड़े जरूर लाता है।
उसकी जेब खाली होती है,
पर बच्चों की कॉपी-किताबें पूरी होती हैं।
वह खुद दवाई टाल देता है,
मगर परिवार की छोटी तकलीफ पर
रातभर जागता रहता है।
कभी खेत में पसीना बहाता है,
कभी फैक्टरी में मशीनों संग जलता है,
कभी शहर की धूल खाता है,
तो कभी कर्ज की आग में
धीरे-धीरे पिघलता रहता है।
पत्नी की खुशी के लिए
अपने अरमान बेच देता है,
बच्चों की पढ़ाई के लिए
जिंदगी गिरवी रख देता है।
सच तो यह है—
एक पिता कभी खुलकर जीता ही नहीं,
वह केवल जिम्मेदारियाँ निभाता है।
बच्चे डॉक्टर बन जाएँ,
इंजीनियर बन जाएँ,
अंग्रेजी स्कूल में पढ़ लें,
बस इसी सपने में
उसकी पूरी उम्र बीत जाती है।
कभी उसने सोचा था
थोड़ा आराम करेगा,
दोस्तों संग बैठेगा,
अपनी अधूरी इच्छाएँ पूरी करेगा…
मगर जिंदगी ने उसे
हर मोड़ पर समझौते ही दिए।
और अंत में…
जब वह रिटायर होता है,
तब भी चैन कहाँ मिलता है?
उसकी पेंशन का हिसाब
घर वालों की नजरों में पहले से लिखा होता है।
जिस पिता ने बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया,
वही पिता
धीरे-धीरे
घर का “एटीएम कार्ड” बन जाता है।
हर महीने की तारीख पर
सबको पेंशन का इंतजार रहता है,
लेकिन किसी को यह याद नहीं रहता
कि उस बूढ़े शरीर ने
पूरी जिंदगी कितने तूफान झेले हैं।
उसकी आँखों में आज भी
परिवार बसता है,
लेकिन कई बार
उसके अपने ही
उसे बोझ समझने लगते हैं।
आज अंतर्राष्ट्रीय विश्व परिवार दिवस है…
तो आइए,
एक बार उस पिता को भी समझें
जो कभी अपने दर्द कह नहीं पाया।
उस माँ को भी समझें
जिसने अपनी भूख छुपाकर
बच्चों को निवाला खिलाया।
परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं,
एक-दूसरे की तकलीफ समझने का नाम है।
जहाँ सम्मान हो,
संवाद हो,
प्रेम हो,
वहीं सच्चा परिवार होता है।
वरना…
एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग भी
अजनबी बन जाते हैं।
मैं आज पूछना चाहता हूँ—
क्या बच्चों का जन्म देना ही
माँ-बाप का कर्तव्य है?
या फिर
बुढ़ापे में उनका सम्मान करना
बच्चों का धर्म भी होना चाहिए?
जिस पिता ने पूरी जिंदगी
घर बनाने में लगा दी,
क्या उसके हिस्से में
दो मीठे शब्द भी नहीं आने चाहिए?
परिवार तभी सुखी होगा
जब घर में रहने वाले लोग
एक-दूसरे को समझेंगे।
क्योंकि—
धन से मकान बनता है,
लेकिन प्रेम से घर बनता है।
और याद रखिए—
जिस घर में बुजुर्गों की आँखें नम होती हैं,
उस घर की खुशियाँ भी
धीरे-धीरे कम हो जाती हैं।
आइए,
इस विश्व परिवार दिवस पर
हम रिश्तों को बचाएँ,
बातचीत को जीवित रखें,
और अपने माता-पिता को
सिर्फ जिम्मेदारी नहीं,
सम्मान और प्रेम भी दें।
क्योंकि—
परिवार टूटता नहीं अचानक,
खामोशियाँ उसे धीरे-धीरे तोड़ देती हैं…॥
डॉ देवीदास क. बामणे ‘संघर्ष’
अध्यक्ष, हिंदी विभाग
भाऊसाहेब नेने कला, विज्ञान और वाणिज्य महाविद्यालय पेण, जि. रायगड – ४०२१०७ महाराष्ट्र (भारत)













