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रिश्तों की साझेदारी संग परिवार

हर रिश्तों में हो साझेदारी |
यह होती सबकी जिम्मेदारी |
तभी मजबूत रहती परिवार की दीवारें सारी |
पति-पत्नी के बीच कुछ होती ऐसी साझेदारी |
तभी तो खुशियों में गुजरती उम्र हमारी |
जैसे दो नाविक संभाले रहते,
तब तक दो पतवार एक नाव की |
जब तक न मिल जाए सागर की किनारी |
तभी तो आने वाले किसी भी तूफान से वे न डरते |
दोनों मिलजुल कर हर तूफान का सामना है करते |
हर हाल अपनी नैय्या को मिलजुल कर पार है लगाते |
दोनों सच्ची साझेदारी है निभाते |
बस ऐसे ही पति-पत्नी की वजह से,
परिवार में सभी रिश्तों की साझेदारी,
बखूबी हरदम समझ पाते |
मंजू की लेखनी का है यही कहना |
परिवार की हर समस्या का समाधान,
आपस में मिलझुल कर करना |
रिश्तों की साझेदारी को हरदम,
जरूरी है सोच समझकर,
सारी जिंदगी आगे बढ़ना ||

मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)

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