
जीवन के गणित का, कुछ यूं ही रहा हाल
रिश्तों के गुणा भाग के लिए मन करे सवाल ।।
अनगिनत भावों का रखा जोड़–घटाव
शून्य सा लगता फिर भी जीवन का वहाब
होती गणित मै जैसे , दशमलब,का भाव
जिंदगी में रहा लोगों का उतना ही सुझाव ।।
इस गुणा,भाग का शेष अनंत जब हो जाता
तब जीवन के गणित का शेष समझ आता ।।
लगे सरल करने हम अनसुलझे प्रश्नों से अपने
दृष्टिकोण उलझने से ,गणित विफल हो जाता ।।
शून्य दस्तक देती ,जब विचारों का जीवन में
तब जोड़ घटाव का महत्व कहां रह जाता ।।
अच्छा है जीवन को गणित की तरह समझना
हर सिक्के के है दो पहलू, मैं ये सोच थम जाता ।।
गणित है तब तक जब तक तुम जीवन चाहो
शून्य के महत्व को समझो, तब जीवन अनन्त हो जाता ।।
©®आशी प्रतिभा( स्वतंत्र लेखिका )
मध्य प्रदेश, ग्वालियर
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित












