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माँ


माँ की ममता की ना समता,
जग में काहू की ना क्षमता।
माँ की दुआ फलै सब काहू,
माँ की कृपा मिटै दुःख दाहू।।
माँ का प्यार सलोना होता,
माँ का साथ न बौना होता।
माँ की शक्ति होए निराली।
माँ की भक्ति न जाए खाली।।
माँ ममता का सागर होती,
माँ लोरी की गागर होती।
माँ का होता सच्चा प्यार,
माँ ही होती सुख का सार।।
माँ केवल माँ ही होती है,
वह नित गीले में सोती है।
माँ तो कभी नहीं है हारती,
उसकी सदा उतारो आरती।।
माँ घर की होती फुलवारी,
माँ खुश खुशी हों त्रिपुरारि।
माँ का जो नित वंदन करते,
वह ही तो भवसागर तरते।।

डॉ. विश्वम्भर दयाल अवस्थी
‘ विद्या – सागर ‘
मो. 271 मुरारी नगर, सिद्धेश्वर रोड,
गली नं. 4 खुर्जा, बुलंदशहर (उ. प्र.)
पि. नं. 203131
स्वरचित मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

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