
जख्म कभी केवल त्वचा पर नहीं होते,
वे भीतर उतर कर
आत्मा की तहों में घर बना लेते हैं।
कुछ घाव दिखाई देते हैं,
कुछ चुपचाप सांसों में रिसते रहते हैं।
समय की धूप भी
हर पीड़ा को सुखा नहीं पाती,
कुछ दर्द छाया की तरह
सदा साथ चलते हैं।
हँसी के पीछे छिपी खामोशी
कई अनकही कहानियाँ कहती है,
और आँखों की नमी
बिना शब्दों के संवाद करती है।
हर चोट सिखाती है
कि सहना भी एक कला है,
और टूटकर भी
खड़े रहना एक साहस।
जख्मों की गहराई में
एक अजीब सी रोशनी होती है,
जो अंधेरे में भी
जीने का रास्ता दिखा देती है।
शायद इसलिए
हर दर्द अंत नहीं होता,
कभी-कभी वही
नई शुरुआत की नींव बन जाता है
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












