
बंधन है, रिश्तों का यह..
जो, बांधे रखे एकसार।
वात्सल्य लूटाते, दादा- दादी..
ज्यों, वट वृक्ष छायादार ।
स्नेह से अभिसिंचित करते…
कूट-कूट कर, भरते संस्कार।
कष्ट सहकर भी, बस देना जानते..
माता-पिता, वृक्ष ऐसे फलदार।
सहभागिता रहती सब कामों में..
जब देखो, तब होती तकरार।
रह न सके, एक- दूजे के बिन…
ऐसा है, भाई- बहन का प्यार।
चाचा-चाची बिना, घर सूना..
अधूरा सा लगे.. घर द्वार।
नित फरमाइशें, पूरी करते..
चाचा, खुशियों का भंडार।
बुआ- फूफाजी, सैर करवाते..
हर पल रहता, उनका इंतजार।
आते ही उनके, रौनक छा जाती..
ज्यों घर पर हो, कोई त्यौहार।
सुख- दुख के हैं, सब साथी..
होती कभी-कभी, मीठी तकरार।
एक- दूसरे का साथ निभाते…
ऐसा है… मेरा प्यारा परिवार।












