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एक सुबह सलौनी


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विधा- कविता/गीत

मैं तेरे जीवन में अब एक, सुबह सलौनी हूँ।
तू मुझको इतना प्यार करे,
फिर जानें क्यों कहे कि मैं तो,
सिर्फ एक पहली हूँ।
मैं तेरे जीवन में अब,
एक सुबह सलौनी हूँ।
बातों में तेरी, है जो ये सादगी।
आँखों में तेरी मानो, मेरा ही सपना।
देखूँ जो तुझको, जब भी मैं सजना।
लगता है मुझको हूँ मैं ,तेरी परछाई
मैं सिर्फ मैं नहीं हूँ………….
मैं तेरे जीवन में अब एक, सुबह सलौनी हूँ।
श्याम जैसे राधे श्याम,
राम जैसे सीता राम।
मेरे संग मानो जैसे जुड़ गया हो भगवान्।
तेरे संग जुड़ा है अब तो,जैसे साँसों का मेरे तार।
अब तो बस मैं तेरे खातिर,
ख़ुशियों की तिजोरी हूँ।
मैं सिर्फ मैं नहीं हूँ…………
मैं तेरे जीवन में अब एक, सुबह सलौनी हूँ।
तेरे इस समर्पण से, ख़ुशियों से भरा है मन।
मुझे अब फिक्र नहीं है, तू मेरे है संग जब।
सारे अपनों की खातिर, अब मैं भी तो समर्पित हूँ।
मैं सिर्फ मैं नहीं हूँ………….
मैं तेरे जीवन में अब एक, सुबह सलौनी हूँ।

रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)

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