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मैं कौन हूं

जन्म दिया प्रभु ने ,स्त्री बना कर भेजा है
कोमल हृदय, ममत्व से परिपूर्ण कर भेजा है

बेटी बनाया किसी की ,लाडली कह पुकारा है
घर में पायल से आंगन सारा महकाया है

बहन बनाया किसी की तो भाई सा प्यार पाया है
हर छोटी-छोटी बातों में मुझको बताया है

जब होती सबसे नाराज़ खुद को जताया है
मनाने आते सब ही खुद को खुशकिस्मत पाया है

कर शादी भेजा ससुराल कहा अब वो घर तुम्हारा है
सबने कहा ये ससुराल वो घर अब मायका है

बहू बनी पत्नी बनी रिश्ते बढ़ते जाते हैं
मां बन फिर किसी की बस मां बन रही जाते हैं

खोने लगती पहचान खुद की क्या यहां पाया है
मैं कौन हूं कोई ये आजतक ना जान पाया है

जब जब खुद के लिए लड़ने का सोचा है
जिम्मेदारी और समाज की दुहाई दे हमको रोका है

क्या वजूद है एक स्त्री का बस नाम की स्त्री रह गयी है
घर के अंदर घूट घूट कर सकती रह गयी है

मैं कौन हूं बस ये सवाल मन में गूंजा करता है
स्वाभिमान है मेरा भी अंतर्मन पूछा करता है

प्रिया काम्बोज प्रिया सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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