
प्रेम का अंकुर
अंकुर प्रेम का फूटे वहाँ, जहाँ हृदय की धरती पावन हो।
रिश्तों की गहराई लिए, जहाँ अंतर्मन श्रंगारित हो।
सच्चाई और विश्वास लिए जब,
जुड़ती डोरी निश्छल प्रेम की।
ईश्वर भी तत्पर होता है,
तब रिश्तों में बंध जाने को।
रिश्तों की गहराई लिए, जहाँ अंतर्मन श्रंगारित हो।
सृजन की शक्ति सबसे बड़ी,
जहाँ ईश्वर रचते हैं सृष्टि।
धरती पर आने के लिए,
जहाँ ईश्वर भी स्वयं मचलते हों।
रिश्तों में गहराई लिए, जहाँ अंतर्मन श्रंगारित हो।
ऊर्जा प्रेम की इतनी पावन,
अंजानों को वश में करती।
अपनत्व लिए जहाँ अपने हृदय में,
सबको गले लगाते हों
रिश्तों में गहराई लिए ,जहाँ अंतर्मन श्रंगारित हो।
स्नेह और सम्मान बाँटकर,
अपनत्व का दीप जलाती है।
माँ बेटी या बहन दोस्त हो,
शक्ति प्रेम की एक ही है।
पिता पुत्र या बंधु सखा हो,
सृजन की शक्ति एक ही है।
अंकुर प्रेम का फूटे वहाँ, जहाँ हृदय की धरती पावन हो।
रिश्तों में गहराई लिए, जहाँ अंतर्मन श्रंगारित हो।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)












