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रूह का सुकून

दिल थम -सा गया है,
खामोश नज़र कुछ कहने लगी,
वादियों की हर इक समा रुह को छूने लगी।

कमबख्त इश्क़ की तासीर भी अजब निकली,
नफ़रतों की हर दीवार मोहब्बत बनने लगी।

जब किसी ने अदब से दुआ -सलाम किया,
रब की मेहर जैसे चौखट पे उतरने लगी।

कोई फ़रिश्ता था शायद मेरी तन्हाई में,
आशिकी की चादर रुह ओढ़ने लगी।

इश्क़ को लफ़्ज़ों में आख़िर मैं बयां कैसे करूं, क्योंकि….
आशिक की हर धड़कन रूहानी शमा बनाने लगी।

तेरा हाथ थाम लूँ तो इबादत सी लगे,
तेरी हर मुस्कान अब मुझे मेरी दुनियाँ सी लगी।

तुझसे इश्क़ करना अब मेरा जुनून ठहरा,
तेरी चाहत मेरी रूह का सुकून बनने लगी।

ये इश्क़ ही तो जीने का मक़सद बन गया,
वरना ये जिंदगी बस राहों में भटकने लगी।

काफ़िले मुसाफ़िर बनकर क्या हासिल हुआ है?
तुझसे इश्क़ करना मेरी मंज़िल बनने लगी।

फ़रियाद बस तेरी खुशियों की करती हूँ हरदम,
मेरी हर नेक दुआ भी अब क़ुबूल होने लगी।

तेरे बिना ये दिल कहीं लगता नहीं,
तेरी धड़कन मेरी धड़कन में उतरने लगी।

मोहब्बत की ये बारिश भी अजब रंग लाई,
सुखी पड़ी हुई रुह फिर से बरसने लगी।

अब तो हर लम्हा तेरे नाम से जुड़ गया,
मेरी तो हर ग़ज़ल तेरी यादों में ढलने लगी।

अनिता महेश पाणिग्राही
सरायपाली छत्तीसगढ़

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