
अब रुत बदल रहे हैं, रंग थोड़ा-थोड़ा
रात ढल रहा है, दिन भी अँधेरा सा लगता है
हवा में ठंडक की आहट उतर आई है
खामोशी भी अब कुछ गहरा सा लगता है
पेड़ों के पत्ते सरगोशियाँ करने लगे
हर किस्सा बीते मौसम का ठहरा सा लगता है
सूरज भी बादलों में छिप जाता है अक्सर
दिल का कोई राज ही चेहरा सा लगता है
रास्ते धुंध में खोने लगे हैं धीरे-धीरे
हर मोड़ अब किस्मत का पहरा सा लगता है
वक़्त की चाल बदलती दिखती है हर पल
बीता हर लम्हा सुनहरा सा लगता है
शामें लंबी होकर साथ निभाने लगीं
तन्हाई का रिश्ता भी गहरा सा लगता है
सपनों की चादर बुनती है हर इक रात
दिल फिर से कुछ कहने को ठहरा सा लगता है
कल की परछाइयाँ साथ चली आती हैं
हर याद का मौसम सुनहरा सा लगता है
नए सफ़र की आहट दिल में उतर आई
पुराना हर मौसम अब ठहरा सा लगता है
आर एस लॉस्टम












