
जयंत प्रसंग।।
एक बार चुनि कुसुम सुहाए।
निज कर भूषन राम बनाए।।
सीताहि पहिराए प्रभु सादर।
बैठे फटिक सिला पर सुंदर।।
सुरपति सुत धरि बायस बेषा।
सठ चाहत रघुपति बल देखा।।
जिमि पिपीलिका सागर थाहा।
महामंद मति पावन चाहा।।
सीता चरन चोंच हति भागा।
मूढ मंद मति कारन कागा।।
चला रुधिर रघुनायक जाना।
सींक धनुष सायक संधाना।।
दोहाः अति कृपाल रघुनायक,
सदा दीन पर नेह।
ता सन आइ कीन्ह छलू,
मूरख अवगुण गेह।।
प्रेरित मंत्र ब्रह्म सर धावा।
चला भाजि बायस भय पावा।।
धारि निज रूप गयउ पितु पाहीं।
राम विमुख राखा तेहि नाहीं।।
भा निरास उपजी मन त्रासा।
जथा चक्र भय ऋषि दुर्वासा।।
ब्रह्म धाम सिवपुर सब लोका।
फिरा श्रमित व्याकुल भय सोका।।
क हूं बैठन कहां न ओही।
राखि को सकई राम कर द्रोही।।
मातु मृत्यु पितु समन समाना।
सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।।
मित्र करई सत रिपु कै करनी।
ता कहं बिबुध नदी बैतरनी।।
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता ।
जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।
नारद देखा बिकल जयंता।
लागी दया कमल चित संता।।
पठवा तुरत राम पहिं ताहि।
क हेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।
आतुर सभय गहेसि पद जाई।
त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।।
अतुलित बलअतुलित प्रभु ताई।
मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।
निज कृत कर्म जनित फल पायउं।
अब प्रभुपाहि सरन तकि आयउं।।
सुनि कृपाल अति आरत बानी।
एक नयन करि तजा भवानी।।
सोरठा,, कीन्ह मोह बस द्रोह ज द्यपि,
तेहि कर बध उचित।
प्रभु छाडेउ करि छोह,
को कृपाल रघुबीर सम।।
राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर, मध्य प्रदेश












