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कवि, कलम और कल्पना

रस : ओज + विचार

कवि वो नहीं जो तुक जोड़ दे, शब्दों को बस तोल रहा,
कवि वो है जो युग की पीड़ा, अपनी साँसों में घोल रहा।
कलम नहीं है लकड़ी-निब की, वो तो ज्वाला की धार है,
जो अन्याय की छाती चीर दे, सत्य की वो तलवार है।

कल्पना क्या है? स्वप्न नहीं, भविष्य का निर्माता है,
टूटे हुए विश्वासों में, रंग नया भर जाता है।
जब कवि की आँखें बरसें, कागज़ पर सावन आता है,
जब कलम अंगारे उगले, सिंहासन हिल जाता है।

कलम वो दीपक है जो, अंधियारों से लड़ता है,
कल्पना वो पंख है जो, मिट्टी को आकाश चढ़ता है।
कवि की साँसों में तूफ़ान, स्याही में समंदर है,
एक शब्द से क्रांति रच दे, ऐसा वो जादूगर है।

कवि सोता नहीं है जग में, जब सब जग गहरी नींद भरे,
वो युग के घावों को सहला, मरहम शब्दों का रखे धरे।
कल्पना से रचता ब्रह्माण्ड, कलम से करता संहार,
झूठ के महलों को ढहा दे, सत्य का रचता संसार।

कवि की कलम बिकती नहीं, चाहे कीमत लाख मिले,
कल्पना झुकती नहीं कभी, चाहे शूलों की राह मिले।
जब तक धरती पर ज़ुल्म रहेगा, कवि की कलम बोलेगी,
कल्पना की मशाल लेकर, हर रात को भोर करेगी।

कवि : गोपाल जाटव विद्रोही खड़ावदा
तह. गरोठ, जिला मन्दसौर, मध्यप्रदेश
सर्वाधिकार सुरक्षित

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