
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है।
भ्रष्टाचार परमो धर्म। यह कोई श्लोक नहीं, आज का संविधान है। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल पर अलार्म नहीं बजता, बल्कि एक आवाज़ आती है कि बेटा आज किसकी जेब हल्की करनी है। नेता से लेकर अभिनेता तक, क्लर्क से कलेक्टर तक, डॉक्टर से वकील तक, और वोटर से ब्रोकर तक सबने एक ही गुरु-मंत्र जप लिया है। इस डिजिटल माया युग में जहाँ डेटा ही देवता है, वहाँ सबसे बड़ा देवता है सुविधा शुल्क। इसे अंग्रेजी में लाइजनिंग फी कहो तो साहब की टाई और टाइट हो जाती है, हिंदी में रिश्वत कहो तो एफआईआर का डर लगता है, इसलिए बीच का रास्ता निकाला गया है कि नाम बदल दो, काम वही रहेगा।
गाँव में प्रधान जी के यहाँ जाओ तो पता चलता है कि नाली बनवाने का बजट आया था, पर नाली कागज पर बह रही है और प्रधान जी का मकान तीन मंजिला हो गया। पूछो तो जवाब मिलेगा कि विकास ऊपर से नीचे बहता है, पहले हमारा घर बनेगा तभी तुम्हारी गली बनेगी। यह है जमीनी लोकतंत्र। शहर में बिल्डर साहब नक्शा पास कराने जाते हैं तो फाइल के साथ एक पतला लिफाफा भी चलता है। लिफाफा हल्का हो तो फाइल भारी हो जाती है, लिफाफा भारी हो तो फाइल एकदम हल्की होकर उड़ते हुए पास हो जाती है। इसे कहते हैं गुरुत्वाकर्षण का नया नियम।
अस्पताल जाओ तो भगवान सफेद कोट में मिलते हैं, पर भगवान के दर्शन के लिए भी पर्ची कटानी पड़ती है। पर्ची के नीचे एक अदृश्य पर्ची और होती है जिसका नाम है तत्काल सेवा शुल्क। दे दो तो ऑपरेशन आज, ना दो तो तारीख पर तारीख। मरीज ठीक हो या ना हो, फीस की सेहत हमेशा बढ़िया रहती है। दवा दुकान वाला भी जानता है कि कमीशन के बिना कोई सिरप गले से नीचे नहीं उतरता। मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव और डॉक्टर की जोड़ी राम लक्ष्मण से ज्यादा पक्की है, बस यहाँ लक्ष्मण के तरकश में सैंपल की जगह गिफ्ट वाउचर होते हैं।
न्याय के मंदिर में जाओ तो वहाँ भी प्रसाद चढ़ता है। तारीखें यूँ मिलती हैं जैसे बुजुर्गों को तीर्थ यात्रा का टिकट मिलता हो। हर पेशी पर वकील साहब नई फीस और नया भरोसा दोनों देते हैं। मुवक्किल सोचता है कि अगली तारीख में फैसला आ जाएगा, और जज साहब सोचते हैं कि अगली तारीख तक तो मेरा ट्रांसफर हो जाएगा। इस आने जाने के खेल में सिर्फ एक चीज स्थिर रहती है, वह है खर्चा। गवाह बिकते हैं, सबूत सो जाते हैं, और कानून की किताब मोटी होती जाती है। मोटी किताब पढ़ने का समय किसके पास है, इसलिए सबने सार निकाल लिया है कि जो देगा वो ले जाएगा।
शिक्षा के मंदिर में सरस्वती अब ट्यूशन पढ़ाती हैं। एडमिशन चाहिए तो डोनेशन दो, डोनेशन के साथ एक डर भी मिलता है कि बच्चा फेल ना हो जाए। मास्टर जी क्लास में कम और कोचिंग में ज्यादा मिलते हैं। नकल रोकने वाला दस्ता खुद नकल की रेट लिस्ट जारी करता है। पेपर लीक होना अब खबर नहीं, रिवाज है। जिस दिन पेपर समय पर हो जाए उस दिन अखबार में हैडलाइन बनती है कि चमत्कार हो गया। डिग्री छपती है, ज्ञान नहीं छपता, पर नौकरी के लिए डिग्री ही चाहिए। नौकरी लगवाने वाला दलाल कहता है कि भाई साहब टैलेंट बाद में दिखाना, पहले लिफाफा दिखाओ।
प्रशासन का हाल पूछो तो हर टेबल पर एक लक्ष्मण रेखा खिंची है। उस रेखा को पार करने का शुल्क है। जन्म प्रमाण पत्र चाहिए तो नगर पालिका में भेंट चढ़ाओ, मृत्यु प्रमाण पत्र चाहिए तो भी भेंट चढ़ाओ। आदमी पैदा होने से मरने तक सरकारी दया पर नहीं, सरकारी दर पर जीता है। पटवारी के बिना जमीन अपनी नहीं लगती, और पटवारी के साथ जेब अपनी नहीं रहती। नक्शा दुरुस्त कराना हो तो नक्शे के साथ नोट का नक्शा भी देना पड़ता है। ऑनलाइन पोर्टल आया तो लगा कि अब सब ठीक होगा, पर पोर्टल भी सर्वर डाउन का बहाना करके उसी पुरानी खिड़की पर भेज देता है जहाँ बाबू जी पान चबाते हुए कहते हैं कि लिंक फेल है, समझे। सब कुछ ऑनलाइन है पर डिजिटल लाइजनिंग से आपका टेंडर ही एल बन कैसे होगा ,बस सब कुछ आसानी से सहज सत्य हो जाता है।
नेता जी चुनाव के समय गली गली घूमते हैं, हाथ जोड़ते हैं, वादे करते हैं। वोटर सोचता है कि इस बार तो अपना आदमी है। जीतने के बाद नेता जी इतने बड़े हो जाते हैं कि गली छोटी लगने लगती है। फिर शुरू होता है ठेके का खेल। सड़क बने ना बने, बिल बन जाता है। पुल उद्घाटन से पहले बह जाता है, पर कमीशन तैर कर किनारे लग जाता है। पूछो तो जवाब मिलता है कि यह प्राकृतिक आपदा थी, और आपदा में अवसर हम ढूंढ लेते हैं। संसद में हंगामा होता है, बाहर हाथ मिल जाता है। जनता के लिए लड़ते लड़ते कब आपस में रिश्तेदार बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
अभिनेता पर्दे पर ईमानदारी के डायलॉग बोलते हैं, और पर्दे के पीछे टैक्स बचाने की स्क्रिप्ट लिखते हैं। ब्रांड एंबेसडर बनकर जनता को ज्ञान देते हैं, और फीस लेते समय जीएसटी से बचने का ज्ञान खुद लगाते हैं। फिल्म में भ्रष्ट पुलिस वाले को गोली मारते हैं, असल जिंदगी में उसी पुलिस वाले के साथ पार्टी करते फोटो खिंचवाते हैं। कला का सम्मान है, कलाकारी का उससे ज्यादा सम्मान है।
वोटर सबसे बड़ा ज्ञानी है। वह जानता है कि सब एक जैसे हैं, फिर भी हर पाँच साल में उम्मीद का लड्डू खाता है। वोट डालने से पहले पूछता है कि भाई क्या मिलेगा। साड़ी, कंबल, दारू, कैश, जो भी मिले, लोकतंत्र का प्रसाद समझ कर ले लेता है। फिर पाँच साल तक कोसता है कि कुछ नहीं हुआ। यह चक्र सुदर्शन चक्र से भी तेज चलता है। ब्रोकर इस चक्र की धुरी है। जमीन हो, नौकरी हो, ट्रांसफर हो, हर जगह एक ब्रोकर बैठा है जो कहता है कि सीधा काम टेढ़ा है, टेढ़े को सीधा मैं कर दूँगा। उसकी फीस को ही अब प्रोफेशनल चार्ज कहते हैं।
डिजिटल इंडिया में अब भ्रष्टाचार भी यूपीआई से हो गया है। कैश का झंझट खत्म, क्यूआर कोड जिंदाबाद। स्कैन करो और काम कराओ। ट्रेस हुआ तो कह देंगे कि यह तो पेमेंट गेटवे एरर था। ऐप बन गए हैं, पोर्टल बन गए हैं, पर पोर्टल के पीछे बैठा आदमी वही पुराना है। उसकी नीयत अपडेट नहीं हुई, सिर्फ तरीका अपडेट हो गया। पहले फाइल दबती थी, अब मेल डिलीट होता है। पहले बाबू मिलता नहीं था, अब कॉल रिसीव नहीं होती। तकनीक ने दूरी मिटाई है, सुविधा शुल्क नहीं।
इस परम धर्म की सबसे बड़ी खूबी है कि यह तुरंत फल देता है। तपस्या नहीं करनी पड़ती, लाइन में नहीं लगना पड़ता, नियम नहीं पढ़ने पड़ते। बस जेब ढीली करो और काम चुस्त। यह सहज है, सरल है, श्रेष्ठतम है, और सबसे ज्यादा आरामदायक है। ईमानदारी का रास्ता लंबा है, उबड़ खाबड़ है, और मंजिल की गारंटी नहीं। इसलिए समझदार लोग शॉर्टकट लेते हैं। शॉर्टकट का नया नाम ही सुविधा है।
अंत में यही कि भ्रष्टाचार अब बुराई नहीं, व्यवस्था है। इसे कोसने वाले भी मौका मिलते ही इसका हिस्सा बन जाते हैं। क्योंकि सिद्धांत पेट नहीं भरते, और आदर्श से एसी नहीं चलती। इसलिए सबने मिलकर नया शास्त्र लिख दिया है। उसका पहला सूत्र है कि लेना और देना दोनों पुण्य है। दूसरा सूत्र है कि पकड़े गए तो पाप, नहीं पकड़े गए तो प्रताप। और अंतिम सूत्र है कि इसी से प्रारंभ, इसी पर अंत।
बाकी सब मोह माया है, मित्र। बस इंतजार करो अगले चुनाव चुनाव का क्योंकि वोटर का अच्छा समय तो सिर्फ चुनावी मौसम में ही आता है।












