
कलम तोड़ना केवल शब्दों का खेल नहीं होता,
यह मन की गहराइयों का अनमोल संयोग होता।
जब भाव उमड़ते हैं हृदय के आँगन में,
तभी सृजन जन्म लेता है जीवन के दर्पण में।
संवेदनाओं की धारा जब बहने लगती है।
कलम स्वयं ही राह नई कहने लगती है।
दुःख, सुख, प्रेम और संघर्ष की हर कहानी।
शब्दों में ढलकर बन जाती है अमिट निशानी।
मनः मस्तिष्क की जटिलता जब सुलझती है।
अंतर्वेदना भी मधुर अभिव्यक्ति में ढलती है।
सामाजिक सरोकारों की जब बात उठती है।
कलम जन-जन की आवाज़ बनकर जुड़ती है।
साहित्य केवल ज्ञान नहीं, अनुभूति भी है,
हर शब्द में छिपी कोई सजीव सृष्टि भी है।
यह जोड़ता है मन को मन से चुपचाप,
बिना बोले ही दे जाता है स्नेहिल प्रताप।
कोई दर्शन, कोई मनोविज्ञान समेटे रहता,
कोई अस्तित्व के प्रश्नों को गहराई से कहता।
इन सबका सुंदर समन्वय ही सृजन कहलाता,
जो युगों-युगों तक मानवता को राह दिखाता।
कलम जब सच्चाई से जुड़कर चलती है,
तभी वह कालजयी रचना में ढलती है।
कलम तोड़ देना है सीमाओं को मिटाना,
और हर दिल में मानवता का दीप जलाना।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












