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ज़ख्मों की गहराई

ज़ख्म जो दिखते हैं, सिर्फ वो ज़ख्म नहीं होते
असल में ज़ख्म वो होते हैं, जो मन में घाव कर जाते हैं
जो जख्म तन पर होते हैं
वह ज़ख्म मरहम ,पट्टी करने से भर जाते हैं
दिल पर लगाते हैं वह जख्म मरहम पट्टी से नहीं हैं भरते
ना ही किसी से कुछ खाने या रोने से नहीं भरते हैं
लोग पूछते हैं,”ठीक हो ना तुम”..?
मैं मुस्कुरा कर कह देता हूं'”हां सब ठीक है”
पर ज़ख़्मों की गहराई तो वही जानेगा
जिसकी रातें करवटें लेते बीतती
है
जख्मों की गहराई मुझे बताते हैं कि
हमने जिंदगी की जंग लड़ी है
जख्म सबूत देते हैं कि हमने हर दर्द को जिया है, सहा है
पर सुनो, ज़ख्मों का भी एक समय होता है
वक्त का मरहम धीरे-धीरे लगता है
आज मुझे जो नासूर सा लगता है
वो कल हमारी ताकत बन जाता है
तो जख्मो की इन गहराइयों से क्या डरना.?
यही जख्म हमें इंसान बनाती है
ज़ख्मों को कोसना नहीं चाहिए
यह ऐसा है,वैसा है, हमें दर्द देता है
इन्हें सहेज कर रखना चाहिए
क्योंकि ज़ख्मों की गहराई ही
हमें दूसरों के दर्द को समझना सिखाती है

डॉ मीना कुमारी परिहार

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