
मेरे हिस्से का वो तीखा शोर, आज ख़ामोशी से सब कुछ कह गया,
बंद कमरे में जो रोया था, वो अश्क आँखों से चुपके बह गया।
बड़ी उम्मीद से देखा था जिसे, वही इंसानियत से दगा कर गया,
पर ज़माने की इस बेरुख़ी को, मेरा मौन ही लाजवाब कर गया।
फिर उठ चुकी हूँ मैं उनसे परे, अब नीयत जान गई संसार की,
अफ़वाहें फैलाने को आतुर है, यहाँ हर एक सूरत इंसान की।
भाँप गई मैं इस ज़माने की फ़ितरत, और ख़ुद को सम्हाल लिया,
इन बेमतलब के शोर-शराबों से, अपनी रूह को निकाल लिया।
दिनचर्या की हर एक साँस जैसे, अथाह अंधकार में डूब गई,
तपस्या मेरी खंडित न हो, मन की आस अब टूट गई।
संध्या काल की मेरी ये पूजा, प्रभु! कहीं विफल न हो जाए,
थक कर आई हूँ द्वार तुम्हारे, कि ये जीवन राह बदल जाए।
मेरी आँखों के बहते जल में, मेरे मन को पिघलने दे,
इस विचलित और विकल हृदय को, भक्ति की राह पे चलने दे।
मुझे निज चरणों में शरण दे दो, प्रभु! यही मेरी अंतिम प्यास है,
झुका ले अपने पावन चरणों में, अब यही ज्योति की अरदास है,
हाँ, यही अब ज्योति की अरदास है…
ज्योति वर्णवाल
नवादा (बिहार)












